ओम प्रकाश (बख्शी)(जन्म)


ओम प्रकाश बक्शी🎂जन्म 19 दिसंबर, 1919⚰️मृत्यु 21 फ़रवरी, 1998
ओम प्रकाश
🎂जन्म 19 दिसंबर,जम्मू
⚰️मृत्यु 21 फ़रवरी, 1998
मृत्यु स्थान मुम्बई
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि।
प्रसिद्धि चरित्र अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी फ़िल्म 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
🎂जन्म: 19 दिसंबर, 1919 जम्मू;
⚰️मृत्यु: 21 फ़रवरी, 1998 मुम्बई) भारतीय सिनेमा जगत में प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता थे। ओमप्रकाश ने लगभग 350 फ़िल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फ़िल्मों में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि शामिल हैं। उनकी अंतिम फ़िल्म 'नौकर बीवी का' थी। महानायक अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में वे ख़ासे सराहे गए। 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई। उनमें कला के प्रति रुचि शुरू से थी। लगभग 12 वर्ष की आयु में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। 1937 में ओमप्रकाश ने 'ऑल इंडिया रेडियो सीलोन' में 25 रुपये वेतन में नौकरी की थी। रेडियो पर उनका 'फतेहदीन' कार्यक्रम बहुत पसंद किया गया।

अभिनय का प्रारम्भ

उन दिनों ओम प्रकाश 'अविभाजित भारत' के 'लाहौर रेडियो स्टेशन' पर स्थायी कलाकार के रूप में कार्यरत थे, और उनकी आवाज़ के जादू से सारा ज़माना परिचित था। द्वितीय महायुद्ध के समय की बात है। ओमप्रकाश को रावलपिण्डी से लाहौर तक का सफर करना था। फ़ौज़ी जवानों से ठसाठस भरी रेलगाडि़यां, और उस भीड़ के बावजूद यात्रा की अनिवार्यता।

तीसरे दर्जे़ का रेल-टिकट था ओमप्रकाश के पास, और घुसने की जगह थी मात्र पहले दर्जे़ में – और वह भी तीन-चार अंगरेज़ सैनिकों के मध्य। मजबूरन उसी डिब्बे में घुसकर जगह बनाने की कोशिश कर डाली ओमजी ने, और अपने उन प्रयत्नों में उनको किंचित सफलता भी मिली।  सैनिक अधिकारी अपने अनजाने,  अनचीन्हें लहज़े में गिटपिट किये जा रहे थे उस समय, और ओमप्रकाश उनकी उस टामी अंगरेज़ी से सर्वथा अनभिज्ञ यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखि़र किस तरह वह उन लोगों की बातचीत में  कोई हिस्सा लें।

तभी उनके दिमाग़ में आया – क्यों न उन लोगों के सामने गूँगे का अभिनय कर डाला जाये? इज़्ज़त तो कम से कम बच ही जायेगी ऐसा करने से। और क़िस्सा -कोताह यह कि खानपान, सुरासेवन आदि के बाद फ़ौज़ी अफ़सरों ने जब ओमप्रकाश से पूछा कि क्या वह जन्म से ही गूंगे हैं तो ओमजी ने इस खबसूरती से अपना सर हिलाया जिससे न यह मालूम हो सकता था कि वह गूंगे हैं और न यही कि वह गूंगे नहीं हैं। सैनिक अधिकारियों के मन में उनके प्रति सहानुभूति जगी. उन्होंने ओमजी को न सिफऱ् भरपूर खिलाया-पिलाया बलिक लेटने के लिये एक पूरी बर्थ भी उनके हवाले कर दी. सुबह होने पर अँग्रेजी ढंग का ब्रेकफ़ास्ट भी उनको मिला और ख़ूब मज़े के साथ उनकी वह यात्रा सम्पन्न हो गयी।

लेकिन लाहौर पहुंचने पर इस अभिनय का पटाक्षेप जब हुआ तो वह सैनिक अधिकारी भी हंसी से सराबोर हो उठे जिन्होंने अपंग समझ कर ओमप्रकाश की इतनी खातिरबाजी की थी। हुआ यह कि जो व्यक्ति ओमजी को लेने स्टेशन आया था उसने पूछ ही लिया – 'कहो बर्खुरदार, सफ़र कैसा कटा?'

सैनिक अधिकारी घूर घूर कर ओमजी की ओर देखते जा रहे थे, और ओम थे कि उनकी ज़बान ही सिमटती जा रही थी। तभी, अपने आत्मविश्वास का संचय करते हुए ओमप्रकाश बोल उठे – 'माफ़ कीजिएगा, बिरादरान, आप लोगों की यह लंगड़ी अँग्रेजी मेरे भेजे के अन्दर नहीं घुस पा रही थी, इसीलिये मुझे गूंगे का अभिनय करना पड़ गया। वैसे यह न समझ लीजिएगा कि अँग्रेजी ज़बान मुझे नहीं आती, मैं भी लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ चुका हूं और उनकी इस बात को सुनते ही उपस्थित लोगों के मध्य हंसी का जो दौर-दौरा शुरू हुआ था उसकी समाप्ति ओमजी के स्टेशन छोड़ने के बाद ही हो पायी।

फ़िल्मी सफ़र
हिन्दी फ़िल्म जगत में ओमप्रकाश का प्रवेश फ़िल्मी अंदाज़में हुआ। वह अपने एक मित्र के यहां शादी में गए हुए थे, जहां पर 'दलसुख पंचोली' ने उन्हें देखा और तार भेजकर उन्हें लाहौर बुलवाया। दलसुख पंचोली ने फ़िल्म ‘दासी’(1950) के लिए ओम प्रकाश को 80 रुपये वेतन पर अनुबंधित कर लिया। यह ओमप्रकाश की पहली बोलती फ़िल्म थीं। संगीतकार सी.

रामचंद्र से ओमप्रकाश की अच्छी दोस्ती थी। इन दोनों ने मिलकर ‘दुनिया गोल है’, ‘झंकार’, ‘लकीरे’ आदि फ़िल्मों का निर्माण किया। उसके बाद ओमप्रकाश ने खुद की फ़िल्म कंपनी बनाई और ‘भैयाजी’, ‘गेट वे ऑफ इंडिया’, ‘चाचा ज़िदांबाद’, ‘संजोग’ आदि फ़िल्मों का निर्माण इस कम्पनी के अंतर्गत किया।

हास्य अभिनेता

क्लासिक फ़िल्म 'प्यार किये जा' का वह दृश्य लें जब महमूद और ओम प्रकाश के बीच एक हॉरर फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती है। ओम प्रकाश यहाँ निश्चित रूप से एक 'फॉइल' की भूमिका अदा कर रहे हैं और उनके शानदार प्रदर्शन से ही महमूद का कहानी सुनाना जीवंत हो पाता है। ओम प्रकाश की भूमिका यहाँ (बिना किसी संवादों के) एकदम निष्क्रिय सी है लेकिन उनकी प्रतिक्रियाओं की बदौलत ही दृश्य उस चरम तक पहुँच पाता है जब कैमरे के फ़्रेम से परे किसी तीसरी पार्टी की आवाज़ हस्तक्षेप करती है और दोनों एक आकस्मिक नीले रंग की रोशनी से सराबोर हो डर जाते हैं। यहाँ इन दोनों के बीच में एक शानदार लेन-देन है जो इनकी भूमिकाओं को और धार प्रदान करता है। जितना अधिक ओमप्रकाश डरते हैं अर्थात् जितना ज्यादा वे पिटे हुए आदमी का अभिनय करते हैं उतना ही दृश्य में मज़ा आता है। इसी सिलसिले में यह भी प्रचलित है कि जब महमूद को इस फ़िल्म में उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कार दिया गया, तब न सिर्फ़ उन्होंने अपने 'फॉइल' ओम प्रकाश को इसका पूरा श्रेय दिया बल्कि मंच से दर्शकों के बीच जाकर उनके पैर भी छुए। एक हास्य अभिनेता हमेशा अभिनय में सहयोगी के महत्व को समझता है और इसे विनम्रता से स्वीकार करता है।

आख़िरी समय
जिस खुले दिल से ओमप्रकाश ने दुनियादारी निभाई थीं इसके ठीक विपरित उनके अंतिम दिन गुजरे। उन्हीं दिनों ओमप्रकाश ने अपने साक्षात्कार में कहा था- 'सभी साथी एक एक करके चले गए। आगा, मुकरी, गोप, मोहनचोटी, कन्हैयालाल, मदनपुरी, केश्टो मुकर्जी आदि चले गए। बड़ा भाई बख्शीजंग बहादुर, छोटा भाई पाछी, बहनोई लालाजी, पत्नी प्रभा सभी तो चले गए...लाहौर में पैदा हुआ. बचपन में चंचल था। रामलीला प्ले में सीता बना करता था। क्लासिकल संगीत की खुजली थीं-10 साल सीखा। रेडियो सीलोन में खुद के लिखे प्रोग्राम पेश किया करता था। मेरा प्रोग्राम बहुत पापुलर हुआ। लोग मुझे देखते तो फतेहदीन नाम से पुकारते थे। असली नाम पर यह नाम हावी होने लगा।

रोचक तथ्य
‘मैंने कई फ़ाकापरस्ती के दिन भी देखे हैं, ऐसी भी हालत आई जब मैं तीन दिन तक भूखा रहा। मुझे याद है इसी हालात में दादर खुदादाद पर खडा था। भूख के मारे मुझे चक्कर से आने लगे ऐसा लगा कि अभी मैं गिर ही पडूंगा। क़रीब की एक होटल में दाखिल हुआ। बढिया खाना खाकर और लस्सी पीकर बाहर जाने लगा तो मुझे पकड लिया गया। मैनेजर को अपनी मजबूरी बता दी और 16 रुपयों का बिल फिर कभी देने का वादा किया। मैनेजर को तरस आ गया वह मान गया। एक दिन 'जयंत देसाई' ने मुझे काम पर रख लिया और 5,000 रुपये दिए। मैंने इतनी बडी रकम पहली बार देखी थीं। सबसे पहले होटल वाले का बिल चुकाया था और 100 पैकेट सिगरेट के ख़रीद लिए।’ -ओम प्रकाश
बहुत कम लोग जानते हैं कि ओमप्रकाश ने ‘कन्हैया’ फ़िल्म का निर्माण भी किया था, जिसमें राज कपूर और नूतन की मुख्य भूमिका थी।
कई रंगारंग व्यक्ति उनके जीवन में आए। इनमें चार्ली चैपलिन, पर्ल एस.बक, सामरसेट मॉम, फ्रेंक काप्रा, जवाहरलाल नेहरू जी भी शामिल हैं।
अओमप्रकाश के समय में हिंदी फ़िल्मों के बडे सितारे मोतीलाल, अशोककुमार, और पृथ्वीराज हुआ करते थे। अपने समय में लोग उन्हें ‘डायनेमो’ कहा करते थे।

🎥ओम प्रकाश की चयनित फिल्मोग्राफी - 
 1994 घर की इज्जत 
 1991 प्रतिकार 
 1990 पति पत्नी और तवायफ, 
           घर हो तो ऐसा 
 1988 हलाल की कामा, गेटवे ऑफ इंडिया,
           बीस साल बाद 
           मोहब्बत के दुश्मन 
 1987 हवालात, राही, ईमानदार
           इंसानियत के दुश्मन
           कलयुग और रामायण 
           मुकद्दर का फैसला 
 1986 करमदाता, भगवान दादा 
           चमेली की शादी, कांच की दीवार 
 1985 अलग अलग, मीठा ज़हर 
           करो दिलों की दास्तान
 1984 ये इश्क नहीं आसां राज तिलक
           राजा और राणा और शराबी 
 1983 रंग बिरंगी, नौकर बीवी का 
           प्यासी आँखें, शुभ कामना  
 1982 प्रेम रोग, धरम कांता 
           बदले की आग, दिल-ए-नादाँ 
           जॉनी आई लव यू और नमक हलाल 
 1981 एक और एक ग्यारह, इतनी सी बात
           बीवी-ओ-बीवी, आस पास, धनवान
           नरम गरम (विशेष उपस्थिति)
           लावारिस और शारदा 
 1980 दो और दो पांच 
           कैदी #203 (अतिथि उपस्थिति)
           दो प्रेमी, अब्दुल्ला और बंदिश
 1979 गोलमाल 
 1978 नया दौर
           परमात्मा (आवाज) (अप्रमाणित)
 1977 आखिरी गोली, आलाप, साहेब बहादुर
           आशिक हूं बहारों का 
 1976 मा 
 1975 जूली, आंधी, चुपके-चुपके 
           धोती लोटा और चौपाटी 
           खुशबू और सुनेहरा संसार 
 1974  रोटी, इंटरनेशनल क्रुक, दो चाटने 
           चौकीदार, सगीना
           दुःख भंजन तेरा नाम 
 1973 जंजीर, लोफ़र, आ गले लग जा
           मन जीते जग जीत और फागुन 
 1972 जोरू का गुलाम, अन्नदाता 
           अपना देश, दिल दौलत दुनिया 
           एक हसीना दो दीवाने और
           मोमे की गुड़िया
 1971 अमर प्रेम, बुड्ढा मिल गया
           पराया धन और परवाना 
 1970 आंसू और मुस्कान, पुष्पांजलि
           पूरब और पश्चिम, सुहाना सफर
           घर-घर की कहानी, गोपी 
           मेरा नाम जोकर
 1969 बड़ी दीदी, चिराग, डोली, प्यासी शाम
           एक श्रीमान एक श्रीमती और साजन 
 1968 दो कलियाँ, एक काली मुस्काई 
           गौरी, कन्यादान, मन का मिलन
           मेरे हमदम मेरे दोस्त  
           पड़ोसन, परिवार और
           साधु और शैतान 
 1967 अमन, अराउंड द वर्ल्ड
           लाट साहब 
 1966 दो दिलों की दास्तां, दस लाख 
           नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे 
           पति पत्नी और प्यार किये जा 
 1965 खानदान और नया कानून 
 1964 आप की परछाइयां, दूर की आवाज
           जहां आरा, कैसे कहूं 
           मेरा क़सूर क्या है, राज कुमार और
           सुहागन 
 1963 भरोसा, नर्तकी 
           तेरे घर के सामने 
 1962 दिल तेरा दीवाना, हाफ टिकट 
           हरियाली और रास्ता और मनमौजी 
 1961 भाभी की चूड़ियाँ और संजोग 
 1960 बिंद्या, महलों के ख्वाब
           दिल अपना और प्रीत पराई 
 1959 चाचा जिंदाबाद, कन्हैया  &
           प्यार की राहें
 1958 बाघी सिपाही, हावड़ा ब्रिज 
           पुलिस और सोहनी महिवाल
 1957 आशा, भाभी, एक झलक 
           गेटवे ऑफ इंडिया, मिस मैरी 
           शारदा और शेरू 
 1956 बसंत बहार, भाई-भाई 
           ढाके की मलमल एवं श्रीमती 420 
 1955 अलबेली, आज़ाद, भगवत महिमा 
           कुन्दन, लगन, मरीन ड्राइव 
           मुसाफिरखाना, पहली झलक और
           दुनिया गोल है
 1954 चोर बाज़ार, डंका, दोस्त, कवि और
           पूजा 
 1953 आस, चालीस बाबा एक चोर, लड़की 
           रेल का डिब्बा और शिकस्त 
 1952 अनहोनी, घुंघरू, हमारी दुनिया
           पूनम 
 1951 बहार, ख़ज़ाना और नाज़नीन 
 1950 सरगम 
 1949 बंसरिया, चार  दीन, लाहौर, नाच
           रात की रानी और सावन भादों 
 1946 ज़मीन आसमान 
 1944 दासी
 

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